गुरुवार, 17 जनवरी 2013

खुद करो

मानव! समूह! एकता! मजबूती। शायद समाज के विकास की यही कहानी होती है। व्यक्ति अकेला रहकर असुरक्षित महसूस करता है, करता था। समूह में उसे एकता नजर आई और वह बाहरी दुश्मनों से सुरक्षित हो गया। 
अपसोस! यह सुरक्षा भी बाहरी ही रह गयी कभी न तो आंतरिक हुई और न करने की कोशिश हुई। आंतरिक सुरक्षा का इंतजाम किस प्रकार हो इस पर भी सवाल है।
ऐसे में मुझे दो महान लोगों के विचार याद आते हैं। एक गायत्री परिवार का "हम सुधरेंगे जग सुधरेगा" और दूसरा भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम का "सभी खामियों के लिए सरकार को जिम्मेदार मानना।" आगे लिखा है "हम सुबह सड़क पर अपना कुत्ता टहलने ले जाते हैं और हमारा कुत्ता जहाँ कहीं भी उसका दिल करता है मल विसर्जन कर देता है जब हम अपने कार्यालय के लिए  हैं तो उसके लिए नगर निगम को गली देते हैं, खुद को कभी नहीं।
जो व्यवस्था हमने बने है उसे चलाने की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए। 

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